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  • Writer's pictureAmit Gupta

रोगो की उत्पत्ति

रोगो की उत्पत्ति

देखने वाली बात यह है कि रोगो की उत्पत्ति क्यों होती है । बढिया खान पान होने के बाद भी हमारा शरीर अस्वस्थ क्यों रहता

है। आयुर्वेद के अनुसार वात-पित-कफ दोषो के दुषित होने से रोग की उत्पति होती है ।

जो कि शरीर के स्वास्थ्य को नष्ट करता है । यह तीनो दोष शरीर मे घुमते रहते है ।

वात दोष – वायु ,धातु ओर मळ को दुसरी जगह ले जाने वाली ,जल्दी चलने वाली ,सुक्ष्म,रूखी , शीतल और हल्की होती है।

वायु योगवाही है। सब दोषो मे वायु ही प्रधान है । इसका मुख्य स्थान पक्वाशय है।

वायु पाँच प्रकार की होती है।

1 उदान वायु 2 प्राण वायु 3 समान वायु 4 अपान वायु 5 व्यान वायु

मनुष्य के कण्ठ मे उदानवायु , हृदय मे प्राणवायु , नाभि मे समानवायु , मलाश्य मेँ अपानवायु और व्यानवायु समस्त शरीर मे रहती है ।



1 उदान वायु –यह गले मे घुमती है । इसी की शक्ति से मनुष्य बोलने और गाने मे समर्थ होता है । जब यह वायु कुपित हो जाती

हे तो शरीर मे रोग पैदा करती है।

2 प्राण वायु ---यह हृदय मे रहती है , मुख मे सदा चलती रहती है तथा प्राणो को धारण करती है । खाये हुए पदार्थो को भीतर

ले जाती है और प्राणो की रक्षा करती है । जब वह कुपित होती है ,तब हिचकी तथा श्वास रोगो को पैदा करती है।

3 समान वायु--- इसका स्थान नाभि मे है ,यह अमाशय व पक्वाशय मे घुमती है और जठराग्नि से मिलकर भोजन को पचाती है

तथा भोजन से जो मल- मुत्र आदि उत्पन होते है,जब वह कुपित हो जाते है, तब म्रदाग्नि अतिसार और पेट मे गैस बनाते है।

4 अपान वायु----- यह पक्वाशय मे रहती है और मल-मुत्र ,शुक्र-वीर्य ,गर्भ और आर्तव को निकालकर बाहर कर देती है। यदि यह

कुपित होती है तो मूत्राशय और गुदा -सम्बन्ध रोग तथा शुक्रदोष ,प्रमेह आदि रोग हो जाते है।

5 व्यान वायु----यह वायु सारे शरीर मे रस ,पसीने और रक्त को बहाने वाली है। नीचे डालना ,ऊपर करना

आखे बन्द करना, खोलना आदि सब कार्य इस वायु के कारण होते है। जब यह कुपित होती है तो शरीर मे रोग

पैदा करती है.।

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