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  • Writer's pictureAmit Gupta

अनार

अनार

अनार के वृक्ष सभी स्थानों पर पाए जाते हैं। इसका वृक्ष मध्यम श्रेणी का होता हैं।

गुण – अनार मीठा, खट्टा खट्टा-मीठा तीन प्रकार का होता है। मीठा अनार त्रिदोषनाशक,

तृप्तिदायक, वीर्यवर्धक, हल्का, ग्राही, स्निग्ध, मेधा, बुद्दि तथा बल प्रदान करने वाला हैं।

यह दाह, तृष्णा, ज्वर, हृदयरोग तथा मुख की दुर्गन्ध को नष्ट करता है।

उपयोग –

अनार का रस संग्रहणी तथा ज्वर में विशेष हितकर हैं। अनार की छाल, जावित्री,

दालचीनी, धनिया तथा काली मिर्च मिलाकर सेवन करने से बच्चो का पुराना

अतिसार दूर होता है।

अनार का रस, घी तथा चीनी की चाशनी बनाकर सेवन करने से वमन रोग दूर होता है।

अनार का छिलका, बबूल की छाल तथा सफेद कत्था औटाकर उसके कुल्ले करने से मुहँ के

छाले व दुर्गंध दूर होती है।

अनार की छाल को गर्म पानी में पकाकर ठंडा करके पिलाने से पेट के सब कृमि निकल

जाते हैं। अनार हृदय के लिए भी अच्छा है। इसके सेवन से पाचनक्रिया प्रदिप्त होती है।

मीठे अनारदानों का रस रात को लोहे के पात्र में रखकर सुबह मिश्री मिलाकर पीने से

पीलिया रोग में फायदा करता है।

आमाशय में जलन हो, मूत्र त्याग के समय अवरोध, वेदना या दाह हो, गर्मी के कारण

नेत्रों मे जलन, गले में खुश्की तथा हृदय में छटपटाहट हो तो अनार के दानों का शर्बत

पीना चाहिए।

अनार के दाने चबाने से पेट का संक्रमण ठीक होता हैं। अनार के छिलकों का चूर्ण 5 से 6 ग्राम

सुबह- शाम जल के साथ सेवन करने से रक्तिम बवासीर मे लाभ होता हैं। किन्तु इस समय में

गरम वस्तुओं का सेवन न करें तथा कब्ज भी न होने दें।




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