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  • Writer's pictureAmit Gupta

ईख

ईख

रक्तपित्तनाशक, बलदायक, वीर्यवर्धक, कफकारक, मधुर, स्निग्घ, मूत्रवर्धक व शीतल है ।

बाल्यावस्था (कच्ची) की ईख कफकारक तथा प्रमेह रोगो को उत्पन्न करती है ।

युवावस्था ( अधपकी ) की ईख वात्तनाशक, मधुर, कुछ तीखी और पित्तनाशक है ।

वृध्दावस्था (पकी ) की ईख रक्तपित्त, क्षयनाशक,बलवर्घक तथा वीर्यवर्धक है ।

ईख की जड़ अत्यंत मधुर होती है । बीच कै भाग में मधुरता कम होती है तथा अग्रभाग

की पोई में कुछ खारापन होता है और इसमे मिठास भी कम होती है ।

चूसी हुई ईख का रस पित्त तथा रक्तविकारनाशक है । यह खांड के समान वीर्यवाला,

कफकारक तथा दाह को उत्पन्न न करने वाला होता है ।

ईख का बासी रस खट्टा, वात्तनाशक, कफ व पित्त और मूत्र को बोडाने वाला होता है ।

पका रस भारी, स्निग्ध, अति तीक्ष्ण, कफ-वात्तनाशक, गुल्म को नष्ट करने वाला तथा

कुछ पित्तकारक है ।

ईख से निर्मित गुड़ आदि तृषा, मुर्छा, पित्त, दाह, भारी, मधुर, बलकारक, पुष्टिकारक,

वातनाशक, वीर्यवर्धक,शीतल और विषनाशक है।

पूर्णतया पकी ईख को नित्य चूसने से गुर्दे की पथरी टुकडे-टुकडे होकर, मूत्र मार्ग से

बाहर निकल जाती है ।



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